Thursday, October 15, 2015

गंगा का महात्म्य

कैलाश के उच्च शिखर भगवान शंकर और गिरिसुता पार्वती बैठे हुए कुछ मनो विनोद कर रहे थे। इधर-उधर की बातों का प्रसंग चल रहा था। स्त्रियों को दूसरों के मामले में दिलचस्पी होने की विशेष रुचि होती है। पार्वती जी के मस्तिष्क में भी अनेक प्रकार के प्रसंग आ रहे थे और एक-एक करके वे योगिराज से पूछती जा रही थी।
अचानक उनकी दृष्टि, भगवती गंगा पर जा पड़ी। पार्वती ने पूछा-भगवन्! इस गंगा को लोग क्यों इतने आदर की दृष्टि से देखते हैं ? शंकरजी ने सहज ही पतित पावनी गंगा का महात्म्य उन्हें सुना दिया। उसे सुनकर पार्वतीजी को बड़ा कौतूहल हुआ इसमें स्नान करने से लोग पवित्र हो जाते हैं, स्वर्ग जाते हैं, मुक्ति पाते हैं यह बात उनके गले न उतर सकी।
संयोग से उसी दिन कोई पर्व था। पार्वती ने दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि गंगा जी से ले सिन्धु तक लाखों नर-नारी गंगा स्नान कर रहे हैं। क्या यह सब पवित्र हो जायेंगे? इन सबको स्वर्ग मिलेगा? उनके मस्तिष्क में शंका और प्रश्नों की झड़ी लग गई।
अंतर्यामी भूतनाथ ने उनकी चिन्ता जान ली। और हल्की हँसी हँसते हुए कहा- प्रिय, मेरे वचनों पर संदेह मत करो। मैं तुमसे अन्यथा नहीं कहता। उद्विग्न मन से पार्वती ने उनके चरण रज मस्तक पर चढ़ाते हुए कहा- नाथ! तब तो स्वर्ग बड़ा सस्ता हो जायेगा, मुक्ति टके सेर मारी मारी फिरेगी। केवल स्नान मात्र से...........
“हाँ, स्नान मात्र से” भगवान् शंकर ने कहा- लेकिन कोई सच्चे हृदय से स्नान करने भी तो जाय! यह जो लाखों मेंढ़कों की भीड़ गंगा तट पर खड़ी हुई है, इनमें कुछ उंगलियों पर गिनने लायक मनुष्य ही वास्तविक गंगा स्नान के लिए आये हैं। शेष तो अपने विभिन्न प्रकार के स्वार्थ साधन एवं मनोरंजनों के लिए पहुँचे हैं।
पार्वती चकरा गई। वे खिन्न होकर झुझलाने लगीं। भगवन्, आपकी एक भी बात मेरी समझ में नहीं आती। आप स्नान से मुक्ति बताते हैं और स्नान करने वालों को मेंढक बताते हैं। इसका क्या तात्पर्य? आप ऐसा उलझन में डालने वाला ज्ञान मुझे क्यों सिखाते हैं? कुछ असंतुष्ट सी होती हुई पार्वती वहाँ से उठ कर नदी के पास चली गई और उसके सींग खुजाने लगीं।
आखिर स्त्री स्वभाव ही जो ठहरा। भगवान् बम भोला उन्हें मनाने के लिए उठे और पास जाकर हँसते हुए बोले- प्रिये! तुम तो रुष्ट हो गई। धर्म का मार्ग कुछ ऐसा गहन है ही। यह उतनी आसानी से समझ में नहीं आता जिस प्रकार की तुम समझना चाहती हो। अच्छा, आओ! मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें प्रत्यक्ष सब बातें दिखा दूँगा। पार्वती जी की इच्छा पूर्ण हो गई। और वे प्रसन्न होती हुई उनके साथ चल दीं। रास्ते में एक सलाह पक्की कर ली गई।


*****
गंगा तट से कुछ दूर एक बड़े राज मार्ग के किनारे शंकर जी कोढ़ी का रूप बनाकर पड़े रहे। पार्वती ने अपना स्वरूप अत्यन्त ही सुन्दर षोडशी का बना लिया।
उस रास्ते गंगा स्नान के लिए जाने वाली भीड़ मुड़ मुड़ कर उन्हें देखती जाती। एक ने कहा- सुन्दरी! इस कोढ़ी के साथ क्यों कष्ट सह रही हो चलो मेरे घर! तुम्हें स्वर्ग का आनन्द मिलेगा। दूसरे ने कहा- मेरे यहाँ किसी बात का घाटा नहीं है फूलों की सेज पर बैठी रहना। सुन्दरी सबकी बातें सुनती रहीं पर उत्तर किसी को कुछ न दिया, सवेरे से शाम हो गई हजारों यात्री उस रास्ते से निकले होंगे। सभी ने तरुणी को मूर्ख बताया कि वह क्यों एक कोढ़ी के साथ रह रही है। बहुतों के मन ललचाये कि यह रमणी हमें मिल जाय। कई ने तो अपनी लालसा शब्दों द्वारा भी प्रकट कर दी।
एक प्रचलित प्रथा के अनुसार किसी किसी ने कोढ़ी के निकट कुछ पाइयाँ फेंक दी। पर पार्वती को फूलों की सेज पर बिठाने के इच्छुकों में से एक ने भी ऐसी सहायता देने का प्रयत्न न किया कि वह अपने उसी पीड़ित पति के साथ सुगमता से रह सके।
अन्त में केवल एक व्यक्ति ऐसा आया जिसने तरुणी के पवित्र धर्म को सराहा। प्रदक्षिणा की उसकी चरणरज मस्तक पर लगाई और कहा- माता! तुम धन्य हो, जो ऐसे संकट के समय में भी अपने धर्म पर दृढ़ हो। जो कुछ वह कर सकता था धन, भोजन आदि की सहायता करके आगे चला गया।
अब सारा काम समाप्त हो चुका था। पार्वती जी काफी अनुभव पा चुकी थी। महादेव जी अपने उस नकली रूप को छोड़ कर उठ बैठे। उन्होंने कहा- अब मेरा कथन तुम्हारी समझ में आया? इतनी बड़ी भीड़ में एक ही व्यक्ति वास्तव में गंगा स्नान को आय था। औरों का उद्देश्य तो मेला देखना, मनोरंजन करना, पर नारियों को कुदृष्टि से देखना, लोगों की निगाह में अपने को धर्मात्मा सिद्ध करना, पापों से मुक्त होने का झूठा आत्म संतोष करना, मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए गंगा को स्नान की रिश्वत देना एवं एक अन्ध परिपाटी का अनुकरण करना होता है।
पार्वती! इन लोगों को गंगा स्नान का कुछ भी फल नहीं मिल सकता। स्वर्ग तो वही पावेगा जिसने अपनी आत्मा को पवित्र कर लिया है।
पार्वती ने परम संतुष्ट होकर कहा- नाथ! आप सत्य कहते हैं। अब मेरी समझ में गंगा का सच्चा महात्म्य आ गया।

गीता का कर्मयोग

श्रीमद्भगवदगीता की प्रवृत्ति युद्ध से विरत होते हुए अर्जुन को युद्धरत करने के लिए हुई है और इसमें गीता का ज्ञान सफल रहा है, अतः मानना होगा कि गीता प्रवृत्ति प्रधान ग्रन्थ है। यों तो उसमें निवृत्ति का भी वर्णन है, परन्तु वह गीता का अपना विषय नहीं। अर्थों की खींचतान यदि न की जावे तो गीता को निष्काम कर्म योग परक मानना ही होगा। गीता के प्रवृत्ति प्रधान होने का एक पुष्ट प्रमाण है उसकी यह परम्परा जो भगवान ने बताया है- 
इमं विघस्त्रे योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। 
विबस्वान मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवे ऽब्रवीत॥
एवं परम्परा प्राप्तमिमं राजर्षयों विदुः। 

‘अविनाशी मुझ परमात्मा ने यह (गीता रूपी) योग सूर्य को बतलाया था। सूर्य ने उसका उपदेश मनु को दिया और मनु ने इक्ष्वाकु को। इसी प्रकार परम्परा द्वारा आये इस योग को राजर्षि लोग जानते रहे।’ 

इस परम्परा में सभी प्रवृत्ति प्रधान क्षत्रिय बताये गये हैं। निवृत्ति प्रधान नारद, सनकादि, दत्तात्रेय प्रभूति को छोड़कर सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु का नाम लिया गया है जो क्षत्रिय वंश के प्रतिष्ठापक एवं कर्मरत नरेश हैं। आगे भी ‘राजर्षियो विदु’ कहा गया है। यह ज्ञान प्रवृत्ति प्रधान राजर्षियों का रहा है। निवृत्ति प्रधान ब्रह्मर्षियों का नहीं। लोक संग्रह के लिये निष्काम होकर राज्य करते हुए, दुष्टों के दमन में तत्पर चक्रवर्ती नरेश इस ज्ञान का आश्रय लेते रहे हैं। इस परम्परा के अतिरिक्त भगवान ने स्थान-स्थान पर स्पष्ट कहा भी है ‘तयोस्तु कर्म संन्यासात कर्मयोगो विशिष्यते’ आदि। 

संपूर्ण गीता निष्काम कर्म योग का शास्त्र है। उसमें कर्मयोग के प्रत्येक पहलू पर विशद रूप से विचार किया गया है। लेकिन पूर्वकाल में वर्णन की रीति ‘समास व्यास विधिना’ थी। किसी विषय को प्रथम कहीं थोड़े शब्दों में कह देते थे और पुनः उसी का विस्तार करते थे। भगवान ने इस परम्परा की रक्षा की है। संपूर्ण कर्मयोग को सूत्र रूप से एक श्लोक में बता दिया है। फिर उसी का विस्तार किया गया है। चार सूत्रों में गागर में सागर भर दिया गया है। वह कर्मयोग की चतुःसूत्री है- 
‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचन। 
भा कर्मफल हेतुभूः मा ते संगो ऽस्त्वकर्मणि॥ 

‘तेरा अधिकार कर्म करने में ही है, फल में कभी नहीं। कर्म फल का कारण मत बन। अकर्म से तेरा साथ न होवे।’ 

‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कर्म करने में तेरा अधिकार है। कर्मयोग का यह प्रथम सूत्र है। इसमें बतलाया गया है कि जीव कर्म करने में स्वतंत्र है। कर्म करने से उसे कोई रोकता नहीं। मनुष्य योनि की यही विशेषता है कि इस मानव शरीर में आकर स्वेच्छानुसार कर्म कर सकता है। वह अपने उत्थान या पतन का मार्ग यहीं बनाता है। मानव शरीर में किये कर्मों को ही वह देव, दैत्य, पशु, तिर्यकप्रभृति योनियों में भोगता है। गीता में इसके विपरीत दो श्लोक आते हैं- 

“ईश्वरः सर्वभूतानाँ हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। 
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया॥” 

ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता है और अपनी माया में उन्हें यन्त्र पर चढ़े हुए की भाँति घुमाता रहता है। 
‘प्रकृतीं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।’

प्राणी मात्र अपने स्वभाव के अनुसार ही बर्ताव करते हैं, वहाँ निरोध कुछ भी नहीं कर सकता। 

इस प्रकार के जो वाक्य आये हैं, उनका तात्पर्य यह नहीं कि मनुष्य कर्म करने में परतंत्र है। यदि वह कर्म करने में परतन्त्र हो तो शास्त्रों के समस्त विधि निषेध व्यर्थ हो जावेंगे। क्योंकि व्यवस्था तो स्वतन्त्र के लिए ही बनती है। परतन्त्रता पूर्वक जो कर्म मानव करेगा, उसका फल भागी भी वह नहीं हो सकता। अतएव कर्म करने में मनुष्य को स्वतन्त्र ही मानना होगा। यही बात भगवान ने प्रथम सूत्र से कही। ईश्वर प्राणिमात्र के हृदय में रहता और उन्हें यन्त्रारूढ़ की भाँति घुमाया करता है, तथा जीवमात्र अपनी अपनी प्रकृति के परतन्त्र है, इसको कहने का उद्देश्य मनुष्य कर्म करने में कहाँ तक स्वतंत्र है, इस स्वतन्त्रता की सीमा बतलाना है। कर्म करने में स्वतन्त्र होते हुए भी मानव ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्’ समर्थ तो है नहीं। उसके कर्म स्वातंत्र्य की सीमा है। 

प्रत्येक व्यक्ति संसार में किसी न किसी विशेष उद्देश्य से आता है और उसका एक जन्म जात स्वभाव भी होता है। वह उस विशेष उद्देश्य को करते हुए और स्वभाव के अनुसार कर्म करने में समर्थ होता है। उनके विपरीत जाने के लिए वह स्वतन्त्र नहीं। उदाहरण के रूप में अर्जुन को लीजिए, पृथ्वी के भार को दूर करने के विशेष उद्देश्य से उसका जन्म हुआ था। अतएव इस कार्य में वह ईश्वर परतन्त्र हुआ। उसे यह कार्य करना ही होगा। ईश्वर समस्त प्राणियों के हृदय में रहता हुआ उन्हें घुमाता रहता है, इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि भगवान उदय में हैं और उन्हीं के प्रकाश से जीव यावत्कर्म करता है। हमारे शरीर के भीतर जितने रक्त के कीटाणु हैं, वे जिस स्थान पर हैं, वहाँ रहने के लिए विवश हैं। कहा जा सकता है कि हमारी शक्ति उनके भीतर है और हमीं उनको संचालित करते हैं। परन्तु वे अपने स्थान पर रहते हुए अपनी चेष्टाओं में स्वतंत्र हैं। ऐसे ही ईश्वर द्वारा नियुक्त स्थान पर रहते हुए, संसार में अपने आने के विशेष उद्देश्य को पूर्ण करते हुए मनुष्य अपनी दूसरी चेष्टाओं में स्वतंत्र है। यही मनुष्य का कर्म स्वातंत्र्य है। 

‘प्रकृतीं यान्ति भूतानि’ में जीव को स्वभावतः परतन्त्र बताया गया है। स्वभाव परतन्त्रता से कर्म की स्वतन्त्रता में तो कोई बाधा आती नहीं। इतना अवश्य होता है कि स्वभाव के विपरीत चलने के लिए मनुष्य समर्थ नहीं। एक व्यक्ति का स्वभाव क्रोधी है। अब वह चाहे कि उसे क्रोध न आवे, यह असम्भव नहीं तो कठिनतम अवश्य है। लेकिन क्रोध के उपयोग में तो वह स्वतंत्र है ही। वह पापियों, दुष्टों तथा अपने दुर्गुणों पर क्रोध करके संसार की भलाई एवं अपनी आत्मोन्नति कर सकता है। दुष्टों से मिल कर निरापराधियों पर क्रोध करेगा तो उसका परिणाम उसके लिए घातक होगा। इसी प्रकार के स्वभावों का भला और बुरा उपयोग हो सकता है। स्वभाव के उपयोग में मनुष्य स्वतंत्र है और यही उपयोग उसकी उन्नति या अवनति का कारण होता है, अतः स्वभाव परतन्त्र होते हुए भी वह कर्म करने में स्वतन्त्र है, ऐसा कहने में कोई बाधा नहीं। इसीलिए भगवान ने ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ कहा। केवल कर्म में अधिकार है, स्वभाव परिवर्तन या ईश्वर के दिये स्थान परिवर्तन में नहीं। 

‘माँ फलेषु कदाचन’ फल में तेरा अधिकार कभी नहीं। यह दूसरा सूत्र है कर्मयोग का। हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि एक ही परिस्थिति में, एक ही प्रकार के साधन से, एक ही कर्म के करने वालों में फल भेद होता है। कोई सफल होता है, कोई विफल होता है, कोई किसी अंश में ही सफल होता है और कोई हानि भी उठाता है। अतः उद्योग का फल उद्योग पर निर्भर हो, ऐसी बात नहीं। फल तो प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त होता है। गोस्वामी जी ने कहा है - 
‘हानि लाभ जीवन मरण -जस अपजस विधि हाथ।’ 

कर्म के परिणाम स्वरूप हानि-लाभ, जीवन-मृत्यु यश एवं अपयश ये प्रारब्ध के अनुसार होते हैं। इन्हें प्राप्त करने में हम परतन्त्र हैं। अतः कर्म का यह फल होगा ही या यह फल होना ही चाहिए ऐसा सोच कर कर्म करने वाले सर्वदा दुख पाते हैं। फल भगवान को समर्पित करके कर्तव्य बुद्धि से कर्म करना चाहिए। फलासक्ति ही सर्वदा कष्ट देती है। यदि फल आसक्ति छोड़ दी जावे तो फिर कष्ट क्यों हो। जिसमें अपना अधिकार नहीं, उसमें आसक्ति करके कष्ट तो भोगना ही पड़ेगा। 

तीसरे सूत्र में कहा गया ‘मा कर्मफल हेतु र्भूः’ कर्म फल के कारण मत बनो ! कर्म करने पर उसका अच्छा या बुरा, पूरा या अधूरा कुछ न कुछ फल तो होता ही है। वह फल मेरे कर्म से, मेरे उद्योग से हुआ है ऐसा मत समझो। क्योंकि कर्म फल का कारण केवल उद्योग तो है नहीं। 

“अधिष्ठानं तथा कर्ताकरणं च पृथग्विधम। 
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ 
शरीवाँमनोभिर्यर्त्कम प्रारभते नरः। 
न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचेते तस्य हेतवः॥ 
तत्रैवं सति कर्तारंमात्मानं केवलं तु यः। 
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न। स पश्यति र्मदुतिः॥” 
18। 14। 15। 16 

अधिष्ठान (कर्म का जो आधार है) कर्ता (करने वाले की शक्ति और योग्यता) नाना प्रकार की सामग्रियाँ (जो उपयोग में आती हैं, उनकी अच्छाई बुराई) विविध प्रकार की भिन्न-भिन्न चेष्टा (जितनी तत्परता से और ठीक समय पर हो) तथा प्रारब्ध (जैसा अनुकूल या प्रतिकूल हो) ये पाँच उन सब उचित और अनुचित कर्मों के कारण होते हैं जो मनुष्य शरीर से, मन से अथवा वाणी से प्रारम्भ करता है। अज्ञता वह जो कर्मों में केवल अपने को कारण मानता है, वह दुर्बुद्धि ठीक नहीं समझता। 
‘प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। 
अहंकार विमूढ़ात्मा कर्ता ऽहमिति मन्यते॥’ 

सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किये जाते हैं, केवल अहंकार से मूढ़ बुद्धि हुआ पुरुष अपने को कर्ता समझता है। यह कर्ता समझना ही बंधन का हेतु है। जब पुरुष अपने को कर्ता मान लेता है, कर्म फल को अपने उद्योग का फल मानता है तो वह उसके पाप-पुण्य का भागी होकर संसार चक्र में भटकता रहता है। कर्तापन का यह अभिमान ही उसे पाप-पुण्य से युक्त करता है। अन्यथा- 

“गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते।” 

त्रिगुण अपने गुणों में ही बर्ताव कर रहे हैं, ऐसा समझ कर उनके द्वारा किये कर्मों से संसक्त नहीं होता। 

‘यस्य नाहंकृतोभावों बुद्धिर्यस्य न लिप्यति। 
हत्वाऽपि स इमान्लोकानहन्ति न निबध्यते॥’ 

‘मैंने यह कार्य किया है’ ऐसा अहंभाव जिसमें नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म में लिप्त नहीं होती, वह त्रिभुवन के संहार के सदृश घोर कर्म करे तो भी न तो वह हत्यारा होता और न उसे उस कर्म से बंधन होता। भगवान शंकर इसके साक्षात उदाहरण भी है। संपूर्ण विश्व का प्रलय करके भी वे शिव कल्याण स्वरूप ही रहते हैं। 

बात यह है कि कर्म में अहंकार व्यक्ति से पाप कराता है। पाप सर्वदा भोगेच्छा या स्वार्थ बुद्धि से होते हैं, ऐसे ही सकाम पुण्य कर्म भी अहंकार युक्त और यशादि की इच्छा से ही होते है। जिसमें अहंभाव नहीं है, उससे न तो पाप हो सकते है और न सकाम पुण्य। वह केवल अपने स्वभाव के अनुसार उस कर्म को करेगा, जिस कर्म विशेष के लिए विश्वनियन्ता ने उसे भेजा है। उसके द्वारा जो भी कर्म होता है, वह विश्वकर्ता की इच्छा ही से होता है। अतः वह उस कर्म के फल से क्यों संसक्त होने लगा। फल से तो संसर्ग तभी होता है जब उस फल में आसक्ति हो। मैंने उसे प्रकट किया है, ऐसा अहंकार हो अतएव भगवान इस अहंकार से जो कि मिथ्याहंकार है, सावधान करते हैं ‘मा कर्मफल हेतु र्भूः’ कर्मफल को अपने उद्योग का फल समझ उसके कारण मत बनो ! यह तो प्रारब्ध की देन है, भगवान का प्रसाद है।

‘माते संगोस्त्वकर्मणि’ यह चौथा और अन्तिम सूत्र है कि तुम्हारा अकर्म से संग न हो ! आलसी बनकर बैठे मत रहो! ‘फल में अपना अधिकार ही नहीं, उद्योग करने पर भी फल होगा यह निश्चित नहीं, फल हो भी तो वह प्रारब्ध से होता है, उद्योग उसका कारण नहीं ऐसा समझकर उद्योग करना ही मत छोड़ दो!’ कर्म करना तुम्हारा कर्तव्य है, अतः तुम्हें कर्म तो करना ही चाहिए। क्योंकि तुम कर्म को छोड़ नहीं सकते। कर्म करने के लिए विवश हो। 
“न कश्चिक्षणमपि आतु तिष्ठत्यकर्मकृत्। 
कार्यते हावशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैगुर्णेः॥” 

कोई उत्पन्न हुआ प्राणी एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों से विवश होकर गुणों द्वारा उससे कर्म कराया ही जाता है। सभी इस प्रकार प्रतिक्षण कर्म करते ही रहते हैं। चाहे हमें इन्द्रियों को रोककर कर्म करने से विरत भी रख सकें, पर मनीराम तो मानने से रहे। उनकी उधेड़बुन तो चला ही करेगी। फिर इस प्रकार इन्द्रियों से कर्म न करना कोई अच्छा तो है नहीं। 
“कर्म्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसास्यरन्। 
इन्द्रियार्थान विसूढात्मा मिथ्याचारः स उच्चयते॥” 

जो मूर्ख बुद्धि पुरुष कर्मेंद्रियों को कर्मों से रोक कर मन के द्वारा विषयों का चिन्तन करता है, वह पाखण्डी कहा जाता है। इस प्रकार के पाखण्ड से कोई भी लाभ नहीं है। इस बाह्य त्याग के द्वारा कोई भी नैष्कर्म्यावस्था को नहीं पाता। 
‘न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्य पुरुषोश्नुते। 
न च सन्यसनादेव सिद्धिं समाधिमच्छति॥ 

कर्म को आरंभ न करने मात्र से पुरुष निष्कर्मावस्था का आनन्द नहीं प्राप्त करता और न तो करते हुए कर्मों को छोड़ देने (कर्म संन्यास) मात्र से नैष्कर्म्य सिद्धि कर पाता है। निष्कर्मता तो मन का धर्म है। शरीर के द्वारा निष्क्रिय हो भी गये तो क्या लाभ ? क्योंकि बंधन और मोक्ष का कारण तो है मन। इस मन को निष्क्रिय बनाना है। मन की निष्क्रियता है कर्म और कर्मफल से अनासक्त रहना। इस के अतिरिक्त शरीर से कर्म छोड़ देने में हानि भी है। सभी जानते हैं कि सत्वगुण का धर्म आनंद, रजोगुण का धर्म क्रिया तथा तमोगुण का धर्म निद्रा एवं आलस्य है। कोई भी निरंतर सत्वगुण में स्थिति रहे, यह नितांत कठिन है। सत्वगुण में स्थिति न रहने पर यदि हम बलात् कर्म को त्याग दें और इस प्रकार रजोगुण में न रहने का दुराग्रह करें तो निश्चय है कि हमें तमोगुण में रहना होगा। हमारे द्वारा निद्रा एवं आलस्य का पोषण होगा। यह स्थिति किसी भी अध्यात्म मार्ग के पथिक के लिए भयंकर है। 

एक महापुरुष का कहना है ‘चोर एवं डाकू तो अच्छे है, उन्हें भगवान मिल सकते है; लेकिन निरंतर आलस्य में पड़े रहने वाले अच्छे नहीं। उन्हें कभी भी प्रभु के दर्शन न होंगे।’ मतलब यह है कि रजोगुण से सतोगुण में पहुंचना ही शक्य है, लेकिन तमोगुण से सतोगुण में नहीं पहुँचा जा सकता। इसलिए वीर कर्म करने वाले डाकू प्रभृति भी राजसिक होने के कारण नींद एवं आलस्य में पड़े रहने वाले लोगों से श्रेष्ठ तथा भगवान के निकट हैं। कुछ भी न करके आलस्य में पड़े रहने की अपेक्षा कुछ भी करना, बुरे से बुरा काम भी करना अच्छा है। क्योंकि क्रिया में मनुष्य तामसिकता से उठकर कुछ तो रजोगुण में आता ही है। 

स्पष्ट है कि बल पूर्वक कर्म का त्याग किसी भी साधक के लिए हितकर नहीं हो सकता। इससे उसकी हानि ही होगी। कर्म त्याग करके वह अपने पतन का मार्ग बना लेगा। अतएव भगवान साधक को सावधान करते हैं ‘माते संगोसत्वकर्मणि’ अकर्म से तुम्हारा संगों न हो ! तुम कहीं आलसी न बन जाओ। इन चार सूत्रों द्वारा गीता के एक ही श्लोक में पार्थ-सारथि ने संपूर्ण कर्मयोग बतला दिया है। कर्म करने में तुम स्वतंत्र हो, परन्तु फल तुम्हारे आधीन नहीं। कर्म का फल हो भी तो उस फल का कारण अपने को मत समझो। साथ ही कर्म करना छोड़ भी मत दो! यही संपूर्ण कर्मयोग है। 
यत्करोषि यदश्नासि यज्जहोषि ददासियत्। 
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदपर्णम॥ 

जो कुछ करते हो, जो भोजन करते हो, जो हवन करते हो, जो दान करते हो और जो तपस्या करते हो वह सब मेरे अर्पण कर दो! कर्म करते रहो, छोड़ो मत! पर उसे कर्तव्य समझकर और उसके फल को भगवदार्पण करते हुए।

भोगे बिना छुटकारा नहीं

वह दोनों सगे भाई थे। गुरु और माता पिता के द्वारा शिक्षा पाई थी, पूजनीय आचार्यों से प्रोत्साहन पाया था, मित्रों द्वारा सलाह पाई थी। उन्होंने वर्षों के अध्ययन, चिन्तन और अन्वेषण के पश्चात जाना था कि दुनिया में सबसे बड़ा काम जो मनुष्य के करने का है वह यह है कि अपनी आत्मा का उद्धार करे। मूर्ख इसे नहीं जानते। वे पत्ते-पत्ते को सींचते फिरते हैं फिर भी पेड़ मुरझाता ही चला जाता है। संसार की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक शारीरिक सभी प्रकार की समस्यायें इसी एक बात पर निर्भर हैं कि आदमी ईमानदार बने, सदाचारी हो, आत्म कल्याण करे।

वे दोनों भाई शंख और लिखित इस तत्व को भली प्रकार जान लेने के बाद तपस्या करने लगे। पास पास ही दोनों के कुटीर थे। मधुर फलों के वृक्षों से वह स्थान और भी सुन्दर एवं सुविधाजनक बन गए। ये दोनों भाई अपनी-अपनी तपोभूमि में तप करते और यथा अवसर आपस में मिलते-जुलते थी।
एक दिन लिखित भूखे थे। वे भाई के आश्रम में गये और वहाँ से कुछ फल तोड़ लाये। उन्हें खा रहे थे कि शंख भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने पूछा यह फल तुम कहाँ से लाये ? लिखित ने उन्हें हंसकर उत्तर दिया-तुम्हारे आश्रम से।
शंख यह सुनकर बड़े दुखी हुए। फल स्वयं कोई बहुत मूल्यवान वस्तु न थे। दोनों भाई आपस में फल लेते देते भी रहते थे किन्तु चोरी से बिना पूछे नहीं उन्होंने कहा-भाई ! यह तुमने बुरा किया। किसी की वस्तु बिना पूछे लेने से तुम्हें चोरी का पाप लग गया। लिखित को अब पता चला कि वास्तव में उन्होंने पाप किया है और पाप के फल का बिना भोगे छुटकारा नहीं हो सकता।
दोनों भाई इस समस्या में उलझ गये कि अब क्या करना चाहिए। पाप का फल तुरंत ही मिल जाय तो ठीक अन्यथा प्रारब्ध में जाकर वह बढ़ता ही रहता है। और आगे चलकर ब्याज समेत चुकाना पड़ता है। निश्चय हुआ कि इस पाप का फल शीघ्र ही भोग लिया जाय। चूँकि दंड देने का अधिकार राजा को होता है इसलिए लिखित अपने कार्य का दंड पाने के लिए राजा सुद्युम्न के पास पहुँचे।
इस तेज मूर्ति तपस्वी को देखकर राजा सिंहासन से उठ खड़े हुए और बड़े आदर के साथ उन्हें उच्च सिंहासन पर बिठाया। तदुपरान्त राजा ने हाथ जोड़कर तपस्वी से पूछा-महाराज कहिये मेरे योग्य क्या आज्ञा है ? लिखित ने कहा-राजन्! मैंने अपने भाई के पेड़ से चोरी करके फल खाये हैं सो मुझे दंड दीजिए इसीलिए आपके पास आया हूँ।
राजा बड़े असमंजस में पड़ा। इस छोटे से अपराध पर इतने बड़े तपस्वी को वह क्या दंड दे। और वह भी ऐसे समय जबकि वह स्वयं अपना अपराध स्वीकार करते हुए दंड पाने के लिए आया है। राजा कुछ भी उत्तर न दे सका।
तपस्वी ने उसके मन की बात जान ली। और उन्होंने न्यायाधिपति से स्वयं ही पूछा कि बताइये शास्त्र के अनुसार चोरों को क्या दंड दिया जाता है? न्यायाधीश अपनी ओर से बिना कुछ कहे शास्त्र का चोर प्रकरण निकाल लाये। उसमें विधान था कि चोर के हाथ काट लिये जायें।
‘यही दंड मुझे मिलना चाहिए।’ तपस्वी ने कहा - न्याय दंड किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। व्यक्तियों का ख्याल किये बिना निष्पक्ष भाव से जो व्यवहार किया जाता है वही सच्चा न्याय है। राजन् तुमने मुझसे आते समय यह पूछा था मेरे योग्य क्या आज्ञा है? मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि शीघ्र ही मेरे दोनों हाथ कटवा डालो।’ राजा विवश था, उसे तपस्वी की आज्ञा पालन करनी पड़ी।
अपने अपराध का दंड पाकर तपस्वी लिखित प्रसन्नतापूर्वक आश्रम को लौट आये। अपने भाई की कर्त्तव्य परायणता और कष्ट सहनशीलता को देखकर शंख का गला भर आया और वे उनके गले से लिपट गये। शंख ने कहा-अपराधी हाथों को लेकर जीने की अपेक्षा बिना हाथों के जीना अधिक श्रेष्ठ है। लिखित ! पाप का फल पाकर अब तुम विशुद्ध हो गये।
शंख की आज्ञानुसार लिखित ने पास की नदी में जाकर स्नान किया। स्नान करते ही उनके दोनों हाथ फिर वैसे ही उग आये। वे दौड़े हुए भाई के पास गए और उन नये हाथों को आश्चर्य पूर्वक दिखाया।
शंख ने कहा-भैया, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। हम लोगों की तपस्या के कारण ही यह क्षतिपूर्ति हुई है। तब लिखित ने और अधिक अचंभित होकर पूछा-यदि हम लोगों की इतनी तपस्या है तो क्या उसके बल से उस छोटे से पाप को दूर नहीं किया जा सकता था ?
शंख ने कहा- ‘न’ पाप का परिणाम भोगना ही पड़ता है। उसे बिना भोगे छुटकारा नहीं मिल सकता।
(महाभारत)

हिन्दुओं की जातीय भावना

हिंदू किसी से द्वेष नहीं करते। यह उनका जन्म जात संस्कार है। इस संस्कार को कोई नष्ट नहीं कर सकता, क्योंकि हिंदुओं के जातीय चिरंजीव का मूल इसी संस्कार से सींचा गया है। विभिन्न संस्कृत के अपने ही कुछ बेगानों के बेसुरे आलाप से तंग आकर हम कितनी ही बार यह सोचते हैं कि हिन्दुओं में यदि शाँति न होती तो बड़ा अच्छा होता। परन्तु यह सोचना ठीक नहीं है। ऐसा हो ही नहीं सकता। कारण, हिन्दु जाति का यह मूलगत संस्कार है। मूलगत संस्कारों के उखाड़ने की चेष्टा मूल को ही उखाड़ने की सी चेष्टा हो जाती है। हिंदुस्तान पर कितनी ही बार विदेशियों के आक्रमण हुए, कितनी ही बार हिन्दुओं को विदेशियों ने लूटा-खसोटा, कितने ही बार भयंकर से भयंकर अत्याचार किये, पर हिन्दुओं के हृदय, रक्त, माँस, मज्जा में उनके प्रति कहीं भी कोई द्वेष नहीं है। इतना शाँत रक्त संसार में अन्य किसी भी जाति का न होगा। कुछ लोगों का यह कहना है कि यह शाँति कायरता है। परन्तु यह सदा स्मरण रहे कि, यह शाँति कायरता में नहीं होती। कायरता अशान्ति की एक देन है। कायर वही होता है, जिसमें सत्य नहीं होता, सत्य पर विश्वास नहीं होता। हिन्दू जिस शाँति के रक्षक हैं, वह सत्यमूलक है। ऐसी शान्ति यदि जगत में सब देशों को प्राप्त हो, तो उनका कल्याण हो जाये। हिन्दुओं की यह द्वेषरहित शाँति जगत के लिए वरेण्य है और इसका हिन्दुओं में सुरक्षित रहना हिन्दुओं के अभ्युदय और जगत के सुख के लिए अत्यंत आवश्यक है। हिन्दू आज संसार को कुछ देना चाहें तो क्या दे सकते हैं। हिन्दू सब कुछ तो खो चुके हैं, इस शाँति के सिवाय अब उनके पास है ही क्या ? इस शाँति को भी यदि वे खो दें, तो वे कहीं के भी न रहेंगे। आवश्यक यह है कि हिन्दू जाति के इस मूलगत संस्कार को हम लोग समझें और जाति के उत्थान के लिए जो कुछ करना चाहें, वह इसी बुनियाद पर करें। 

हिन्दुओं की यह शाँति अवश्य ही दोषों से बिलकुल खाली नहीं है। शाँति तो है, पर उसके साथ कुछ दोष भी हैं, जिनको दूर करना होगा। ये दोष वे ही हैं, जिनके कारण हम आज वह नहीं हैं, जो कुछ कि हम होना चाहते हैं, जिसके लिए हिन्दुओं का हिन्दू जातीय जीवन है। वे दोष क्या हैं ? हम बहुत से दोषों की चर्चा नहीं करेंगे, एक मुख्य दोष ही सामने रखते हैं, जिसमें पाठक देखेंगे कि अन्य कई दोषों का समावेश हो जाता है। वह दोष यही है कि हिन्दुओं में जाति की मर्यादा की अपेक्षा व्यक्ति की मर्यादा बहुत अधिक बढ़ गयी है। व्यक्ति सदा ही शाँति का एक छोटा सा अंग मात्र है, पर जातीय शरीर का यह छोटा सा अंग जाति के विराट शरीर से भी बड़ा हो गया है- आकार में नहीं, मनोभाव में। तरंग समुद्र का एक अंग है, वह समुद्र से कभी बड़ा नहीं हो सकता, पर मान लीजिए कि कोई तरंग अपने आपको समुद्र से बड़ा मान ले, तो इसे आप जितना उपहासास्पद समझेंगे, उससे किसी व्यक्ति का अपने आपको जाति से बड़ा मान लेना कम हास्यास्पद नहीं है। व्यक्ति का भी एक स्वातंत्र्य होता है, पर वह जाति के एकाँश में होता है। जाति के बाहर नहीं, जैसे तरंग समुद्र के अन्दर रहकर ही चाहे जितना ऊँचा उछल सकता है, समुद्र से अलग होकर नहीं। व्यक्ति का कोई अस्तित्व ही नहीं है, यदि वह जाति के अन्दर न हो। व्यक्ति जाति का अभिन्न अंग है। प्रत्येक हिन्दू, हिन्दू जाति का अभिन्न अंग है, किसी को हम अपने से अलग नहीं कर सकते, अलग किया जाना बरदाश्त नहीं कर सकते और कोई अलग होकर हिन्दू रह भी नहीं सकता। विचारकाल में यह बात तो हमें जंचती है, पर क्या व्यवहार में हमें इसका कोई अनुभव होता है ? यदि होता तो हिंदुओं की जन्मजात सत्यमूल शाँति बदनाम न होती और हम लोग इतने हीन, इतने दीन, इतने असहाय न होते। 

लोग कहते हैं और उनका यह कहना ठीक है कि, मुसलमानों में जैसी जातीय एकता है, वैसी हिन्दुओं में नहीं है। हिन्दुओं में जो शाँति है वह चाहे मुसलमानों में न हो, पर मुसलमानों में जो जातीय एकता है वह हिंदुओं में नहीं है, यह बात तो माननी पड़ेगी क्या ही अच्छा होता यदि मुसलमान हिंदुओं से शाँति ले लेते और हिन्दू मुसलमानों से जातीय एकता सीख लेते। 

जातीय एकता क्या है ? इस एकता का, सबकी समझ में आने योग्य एक छोटा सा नाम है अभिमान। हमें इस बात का अभिमान होना चाहिए कि, हम हिन्दू हैं और कोई भी हिन्दू, चाहे वह किसी जाति का हो, हमारा भाई है-केवल विचार में नहीं व्यवहार में भी। कोई गृहस्थ जब ईश्वर से अपने सुख के लिए प्रार्थना करता है, तो उस प्रार्थना का क्या आशय होता है? उसकी प्रार्थना अपने घर के सब लोगों के सब प्रकार के सुख के लिए होती है। इसी तरह प्रत्येक हिन्दू की कामना-प्रार्थना सब हिंदुओं के लिए-हिन्दूमात्र के लिए होनी चाहिए। ईश्वर हमारी रक्षा करे। यह जब हम कहते हैं, तो चित्त में यह भाव जागता हुआ होना चाहिए कि, ईश्वर हम सब हिंदुओं की रक्षा करें। हम जो ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हैं, वैश्य हैं, शूद्र हैं और अंत्यज हैं-वे सब हमारे अंग हैं, हमसे भिन्न नहीं, हमारा सुख इन सबके सुख में है हमारा जीवन इन सबका जीवन है। मनुष्य का जैसा मन होता है, वैसा ही उसके द्वारा आप ही प्रचार हुआ करता है, चाहे वह सुख से एक शब्द भी न बोले। व्याख्यानों में बड़ी-बड़ी बातें कहकर पीछे उन्हें भूल जाने की अपेक्षा बिना कुछ कहे ही मन को ऐसा बना लेना कि, वह जातीय मन हो जाय। जाति की हितकामना से सर्वथा सहज अभिन्न-बहुत अधिक काम करता है, क्योंकि ऐसे मन से वे ही परमाणु निकला करते हैं। यह बात तो वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा भी सिद्ध हो चुकी है। यदि हम ब्राह्मण होकर भी चांडाल को अपना भाई समझते हैं, तो बिना कुछ कहे-सुने ही चांडाल भी हमें देखने के साथ ही अपना भाई मानता है। हिंदुओं का मन तो अत्यंत वैयक्तिक होकर जाति की मर्यादा को बराबर लाँघता आ रहा है, यही हिंदुओं के समष्टिगत और व्यक्तिगत दुख का कारण है। यही दोष है, जो हिंदुओं की स्वभावगत शाँति की अव्यर्थ शक्ति को ऊपर उठने नहीं देता। 

स्कूलों में, कालेजों में, पाठशालाओं और विद्यालयों में हिंदू बालकों की शिक्षा का यह प्रधान अंग होना चाहिए कि, वे हिंदूमात्र को अपने से अभिन्न समझें, उसके सुख-दुख को अपना सुख-दुख मानना सीखे और हिंदू जाति के किसी अंग पर किसी प्रकार का आघात होने पर उसे अपने ऊपर होने वाला आघात अनुभव करे। यह शिक्षा का काम है। घरों में, विद्यालयों में, सभाओं में और समाचार पत्रों में इसी मर्म को ध्यान में रखकर यथा प्रसंग लोकमत को ऐसा ही बनाने का सच्चे हृदय से जो भी प्रयत्न किया जायगा, यह अवश्य हितकर होगा। 

दो ही बातें ध्यान में रखने की हैं- (1) हिंदुओं की शाँति हिंदू जाति का मूलगत संस्कार है, इसके विपरीत छेड़छाड़ न कर इसे पुष्ट ही करना चाहिए और (2) हिंदूमात्र मा मन जातीय भावना से इस तरह भर जाय कि हिंदूमात्र की व्यक्तिगत कामना और जातीय हितकामना एक ही चीज हो। हिंदुओं का आगे जो कुछ करना है, उसके ये दो मूल सिद्धाँत हैं।

ब्राह्मणों से श्रेष्ठ

दुनियादारी के चक्कर में चिरकाल तक पिसने के बाद आत्मा को एक विशेष शाँति की आवश्यकता होती है। भगवान भास्कर दिन भर अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए एक विश्राम चाहते थे। वे एकान्त सेवन के लिए अस्त ही हुआ चाहते थे। इस संध्या समय में महर्षि गौतम का आश्रम बड़ा शोभायमान हो रहा था। संध्या की सुनहरी धूप ने मानो उस उपवन में स्वर्ण बखेर दिया हो। गुरु चरणों के निकट बैठकर छात्रगण अपना पाठ पढ़ रहे थे। 

इसी समय एक अपरिचित बालक आया। उसने परिक्रमा करके गुरुचरणों में प्रणाम किया और विनम्र भाव से कहने लगा-भगवान ! मैं विद्या पढ़ने के लिए आपके चरणों में उपस्थिति हुआ हूँ। मुझे विद्या दान दीजिए। 

गुरु ने बालक को आशीर्वाद दिया और पूछा - वत्स, तुम्हारा क्या वर्ण है ? वर्ण के अनुसार ही विभिन्न विद्याएं प्राप्त करनी चाहिए। ब्रह्म विद्या का अधिकार ब्राह्मणों को ही है। 

बालक ने मस्तक झुकाकर उत्तर दिया - ‘भगवान मुझे अपने वर्ण का पता नहीं है। मैं जाकर अपना वर्ण पूछ आता हूँ।’ 

आश्रम में चलकर नदी को पार करता हुआ बालक अपनी कुटी पर पहुँचा। भीतर पुत्र की प्रतीक्षा में मरतर बैठी हुई थी एक मन्द दीपक पास में टिलटिला रहा था। पुत्र को आया देखकर माता को चिन्ता प्रसन्नता में परिणत हो गई। 

बालक ने माता से गुरु का प्रश्न कह सुनाया। पूछा -”माता ! मैं किस वर्ण का हूँ? मेरे पिता कौन हैं?” 

माता की आंखें लज्जा से पृथ्वी में गड़ गई। उसने धीमे स्वर में कहा-”पुत्र! बड़ी दरिद्रता की दशा में मैंने अपना जीवन काटा है। युवावस्था में पेट के लिए मुझे अनेक पुरुषों की सेवा करनी पड़ी है। मेरी गोदी है, किन्तु पति कोई नहीं।’ 

कर्म सबको करना होता है। रूप धारण करके कोई निःचेष्ट नहीं रह सकता। प्रकृति के चक्र पर संपूर्ण पदार्थ चाक पर चढ़ी हुई मिट्टी की तरह घूमते रहते हैं। दूसरा दिन आया। प्रातःकाल होते ही सूर्य ने पुनः अपना कर्तव्य कर्म आरंभ कर दिया। वन पर्वत सभी प्रातः रश्मियों से चमक उठे। गुरु गौतम के आश्रम की पाठशाला में वेद ध्वनि सुनाई पड़ने लगी। 

बालक सत्य काम आया और ऋषि के चरणों में प्रणाम करने चुपचाप खड़ा हो गया। 

गुरु ने पूछा - पूछ आये ? बताओ किस वर्ण के हो ? 

बालक ने कहा - भगवन् मेरी माता ने कहा है - ‘बड़ी दरिद्रता की दशा में मैंने अपना जीवन काटा है। युवावस्था में पेट के लिए मुझे अनेक पुरुषों की सेवा करनी पड़ी है। मेरी गोदी है, किन्तु पति कोई नहीं।’ 

छत्ते की क्रुद्ध बर्रों की तरह छात्रगण आपस में भिनभिनाने लगे। धर्म का वास्तविक तत्व से अपरिचित वर्ण धर्म का मूल रहस्य न जानने वाले किसी कुल में जन्म लेने मात्र के कारण ही से उस व्यक्ति के संबंध में मत निर्धारित कर लेते हैं। 

परन्तु गुरु दृष्टा थे। उनने जान लिया कि आत्म दोष को सबके सामने निस्संकोच प्रकट कर देने वाला, अपमान के भय से विचलित न होने वाला और हानि होने की संभावना देखते हुए भी सत्य पर दृढ़ रहने वाला नीच नहीं हो सकता। 

महर्षि गौतम अपने आसन पर से उठे और भुजाएं पसार कर बालक को छाती से लगा लिया और कहा- वत्स सत्य काम! तुम ब्राह्मणों से श्रेष्ठ हो। 

(छाँदोग्य उपनिषद्)

ईश्वर की प्राप्ति के लिए

चिरकाल से हम दरवाजे-दरवाजे पर भीख माँग रहे हैं और भ्रमवश असत्य को सत्य समझ कर उस पर विश्वास कर रहे हैं। परन्तु दरअसल हम ऐसे है नहीं। सम्राटों के भी सम्राट परमात्मा की हम संतान-राजकुमार और राजकुमारियाँ हैं। अब हम द्वार-द्वार पर भीख न माँगेंगे। न किसी के सामने गिड़गिड़ायेंगे। अब हम अपने उन ईश्वरीय गुणों को प्राप्त करेंगे जो कि हमारी पैतृक सम्पत्ति है। हमारे सम्मुख स्वर्ग का द्वारा खुला हुआ है फिर हम बाहर ही क्यों खड़े रहें ? परमात्मा हमें इस छोटे जीवन की अपेक्षा एक बहुत विशाल जीवन में प्रवेश करने के लिए बुला रहा है। चलो बढ़ें और उसका निमंत्रण स्वीकार करें। 

अपने को क्षुद्र और नीच समझना घातक है। हीनता और तुच्छता के विचार हमें हमारी वास्तविक शक्ति से वंचित किये हुए हैं। संसार में दुख और झगड़े भरे पड़े हैं। ऐसा सोचने से संसार सौंदर्य देखने वाला मानव हृदय निर्बल हो जाता है। असल में आदमी तुच्छ जीव नहीं है। यह संकल्प करे तो वह परमात्मा के पद को प्राप्त कर सकता है। हम अपने शरीर और मन के राजा हैं। अपनी प्रत्येक बात, कर्म और परिस्थिति के निर्माणकर्ता हैं। जिस दिन हम अपनी शक्ति सत्ता के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करते हैं। हमें चाहिए कि ठीक उसी क्षण से अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करने के लिए चल पड़ें।

अस्वाद

यह व्रत ब्रह्मचर्य से निकट सम्बन्ध रखने वाला है। मेरा अपना अनुभव तो यह है कि यदि इस व्रत का भली-भाँति पालन किया जाए तो ब्रह्मचर्य अर्थात् जननेन्द्रिय संयम बिलकुल आसान हो जाए। पर आमतौर से इसे कोई भिन्न व्रत नहीं मानता, क्योंकि स्वाद को बड़े-बड़े मुनिवर भी नहीं जीत सके हैं। इसी कारण इस व्रत को पृथक स्थान नहीं मिला। यह तो मैंने अपने अनुभव की बात कही। वस्तुतः बात ऐसी हो या न हो तो भी चूँकि हमने इस व्रत को पृथक माना है, इसलिए स्वतंत्र रीति से इसका विचार कर लेना उचित है। 

अस्वाद के मानी हैं, स्वाद न करना। स्वाद अर्थात् रस-जायका। जिस तरह दवाई खाते समय इस बात का विचार नहीं करते कि आया वह जायकेदार है या नहीं, पर शरीर के लिए उसकी आवश्यकता समझ कर ही उसे योग्य मात्रा में खाते हैं, उसी तरह अन्न को भी समझना चाहिए। अन्न अर्थात् समस्त खाद्य पदार्थ अतः इनमें दूध-फल का भी समावेश होता है। जैसे कम मात्रा में ली हुई दवाई असर नहीं करती या थोड़ा असर करती है और ज्यादा लेने पर नुकसान पहुँचाती है, वैसे ही अन्न का भी है। इसलिए स्वाद की दृष्टि से किसी भी चीज को चखना व्रत भंग है। जायकेदार चीज को ज्यादा खाने से तो सहज ही व्रत भंग होता है। इससे यह जाहिर है कि किसी पदार्थ का स्वाद बढ़ाने, बदलने या उसके अस्वाद को मिटाने की गरज से उसमें नमक वगैरह खिलाना व्रत को भंग करना है। लेकिन यदि हम जानते हों कि अन्न में नमक की अमुक मात्रा में जरूरत है और इसलिए उससे नमक छोड़ें, तो इससे व्रत का भंग नहीं होता। शरीर-पोषण के लिए आवश्यक न होते हुए भी मन को धोखा देने के लिए आवश्यकता का आरोपण करके कोई चीज मिलाना स्पष्ट ही मिथ्याचार कहा जाएगा। 

इस दृष्टि से विचार करने पर हमें पता चलेगा कि जो अनेक चीजें हम खाते हैं, वे शरीर रक्षा के लिए जरूरी न होने से त्याज्य ठहरती हैं और यों जो सहज ही असंख्य चीजों को छोड़ देता है, उसके समस्त विकारों का शमन हो जाता है। ‘पेट जो चाहे सो करावे’, ‘पेट चांडाल है’, ‘पेट कुई, मुँह सुई’, ‘पेट में पड़ा चारा तो कूदने लगा विचारा,’ ‘जब आदमी के पेट में आंत है रोटियाँ। फूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँ।’, ये सब वचन बहुत सारगर्भित हैं। इस विषय पर इतना कम ध्यान दिया गया है कि व्रत की दृष्टि से खुराक की पसन्दगी लगभग नामुमकिन हो गयी है। इधर बचपन ही से माँ-बाप झूठा हेतु करके अनेक प्रकार की जायकेदार चीजें खिला-खिला कर बालकों के शरीर को निकम्मा और जीभ को कुत्ती बना देते हैं। फलतः बड़े होने पर उनकी जीवन-यात्रा शरीर से रोगी और स्वाद की दृष्टि से महा विकारी पायी जाती है। इसके कड़ुए फलों को हम पग-पग पर देखते हैं अनेक तरह के खर्च करते हैं, वैद्य और डाक्टरों को सेवा उठाते हैं और शरीर तथा इन्द्रियों को वश में रखने के बदले उनके गुलाम बनकर अपंग सा जीवन बिताते हैं। एक अनुभवी वैद्य का कथन है कि उसने दुनिया में एक भी नीरोग मनुष्य को नहीं देखा। थोड़ा भी स्वाद किया कि शरीर भ्रष्ट हुआ और तभी से उस शरीर के लिए उपवास को आवश्यकता पैदा हो गई। 

इस विचारधारा से कोई घबराये नहीं। अस्वाद व्रत की भयंकरता देख कर उसे छोड़ने की भी जरूरत नहीं। जब हम कोई व्रत लेते हैं, तो उसका यह मतलब नहीं कि तभी से उसका संपूर्ण पालन करने लग जाते हैं। व्रत लेने का अर्थ है, उसका संपूर्ण पालन करने के लिए, मरते दम तक, मन, वचन और कर्म से प्रामाणिक तथा दृढ़ प्रयत्न करना। कोई व्रत कठिन है इसीलिए उसकी व्याख्या को शिथिल करके हम अपने आपको धोखा न दें। अपनी सुविधा के लिए आदर्श को नीचे गिराने में असत्य है, हमारा पतन है। स्वतन्त्र रीति से आदर्श को पहचान कर, उसके चाहे जितना कठिन होने पर भी, उसे पीने के लिए जी-तोड़ प्रयत्न करने का नाम ही परम अर्थ है, पुरुषार्थ है-( पुरुषार्थ का अर्थ हम केवल नर तक ही सीमित न रखें, मूलार्थ के अनुसार जो पुर यानी शरीर में रहता है, वह पुरुष है, इस अर्थ के अनुसार पुरुषार्थ शब्द का उपयोग नर-नारी दोनों के लिए हो सकता है।) जो तीन कालों में महाव्रतों का संपूर्ण पालन करने में समर्थ है, इसके लिए इस जगत में कुछ कार्य-कर्तव्य है नहीं, - वह भगवान है, मुक्त है। हम तो अल्प मुमुक्षु-सत्य का आग्रह रखने वाले, उसकी शोध करने वाले प्राणी हैं। इसलिए गीता की भाषा में धीरे-धीरे पर अतन्द्रित रह कर प्रयत्न करते चलें। ऐसा करने से किसी दिन प्रभु-प्रसादी के योग्य हो जाएंगे और तब हमारे तमाम विकार भी भस्म हो जाएंगे।

अस्वाद-व्रत के महत्व को समझ चुकने पर हमें उसके पालन का नये सिरे से प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए चौबीसों घंटे खाने की ही चिन्ता करना आवश्यक नहीं है। सिर्फ सावधानी की-जागृति की-बहुत ज्यादा जरूरत है। ऐसा करने से कुछ ही समय में हमें मालूम होने लगेगा कि हम कब और कहाँ स्वाद करते हैं। मालूम होने पर हमें चाहिए कि हम अपनी स्वाद वृत्ति को दृढ़ता के साथ कम करें। इस दृष्टि से संयुक्त पाक-यदि वह अस्वाद वृत्ति से किया जाय-बहुत मददगार है। उसमें हमें रोज-रोज इस बात का विचार नहीं करना पड़ता कि आज क्या पकायेंगे और क्या खावेंगे ? जो कुछ बना है और जो हमारे लिए, त्याज्य नहीं है, उसे ईश्वर की कृपा समझ कर, मन में भी उसको टोका न करते हुए, संतोषपूर्वक शरीर के लिए जितना आवश्यक हो, उतना ही खाकर हम उठ जाएं। ऐसा करने वाला सहज ही अस्वाद-व्रत का पालन करता है। संयुक्त रसोई बनाने वाले हमारा बोझ हलका करते हैं-हमारे व्रतों के रक्षक बनते हैं। वे स्वाद कराने की दृष्टि से कुछ भी न पकावें, केवल समाज के शरीर पोषण के लिए ही रसोई तैयार करें। वस्तुतः तो आदर्श स्थिति वह है, जिसमें अग्नि का खर्च कम से कम या बिल्कुल न हो। सूर्यरूपी महा अग्नि जो खाद्य पकाती है, उसी में से हमें अपने लिए खाद्य पदार्थ चुन लेने चाहिए। इस विचार-दृष्टि से यह साबित होता है कि मनुष्य प्राणी केवल फलाहारी है। लेकिन यहाँ इतना गहरा पैठने की जरूरत नहीं। यहाँ तो विचारना था कि अस्वाद-व्रत क्या है, उसके मार्ग में कौन-सी कठिनाइयाँ है और नहीं है तथा उसका ब्रह्मचर्य के साथ कितना अधिक निकट संबंध है। इतना ठीक-ठाक हृदयंगम हो जाने पर सब इस व्रत के पालन का शुभ प्रयत्न करें।